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जीवन जीने की कला सिखाए, वह है अध्यात्म: पढ़ें संत कबीरजी और गोरखनाथजी का अद्वैत ज्ञान संवाद

संदीप गौतम, अनादि न्यूज़ डॉट कॉम।  एक बार संत कबीरजी से गोरखनाथजी ने पूछा: आपने तो सफ़ेद कपड़ा पहना है, आपको पत्नी है, बेटी है, बेटा भी है, आप तो गृहस्थी हैं फिर आप महान संत कैसे ?

कबीरजी बोले: भाई ! हम महान नहीं हैं, हम तो कुछ नहीं हैं

नहीं, आप मुझे बताओ !

तो कबीरजी उनको अपने घर ले गये। दोपहर के 2 बजे का समय था, पत्नी को बोला: लोई!

दीया लाओ, मैं अब जरा ताना बुनूं धूप में.

ऐसा नहीं कि घर में कमरे के अन्दर। पत्नी आई दीया पकड़ के खड़ी हो गयी, धूप में और पति ताना बुन रहे हैं। गोरखनाथ जी सोचते हैं: कबीर तो पागल हैं पर लोई भी पागल हैं ! माथे पर अभी दोपहर का सूर्य तप रहा है !

इतने में विद्यालय से कबीरजी की बेटी कमाली आ गयी। कमाली माँ के हाथ से दीया लेकर स्वयं दीया ले के खड़ी हो गयी। वह नहीं पूछती है कि ‘अम्मा ! यह क्यों कर रही है ?’ माँ जो कर रही है न, बस माँ को काम से छुड़ा के स्वयं ने सेवा ले ली।

इतने में बेटा कमाल आ गया। देखा कि बहन के हाथ में दीया है, ‘अरे मेरी कुँवारी बहन बेचारी कष्ट सहन कर रही है ! ‘बोला: नहीं बहन ! तू जा के भजन कर.” कमाल ने दीया ले लिया।

गोरखनाथजी तो देखते रह गये कि ‘यहाँ एक पागल नहीं है, माई भी पागल, भाई भी पागल, बेटी भी पागल, बेटा भी पागल! ये तो चारों पागल हैं।

गोरखनाथजी कबीरजी को बोलते हैं: “मेरे को आप बताओ कि आप घर में कैसे रहते हैं ?

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आप बोलते हैं कि हम अकेले हैं घर में, आप तो चार हैं,

कबीरजी ने कहा: “महाराज! चार कैसे, हम एक ही हैं.”

बोले: “एक कैसे ? तुम्हारी पत्नी है, बेटा है, बेटी है।”

“महाराज! बेटा-बेटी, पत्नी और मैं- हम चार दिखते हैं परन्तु हम सब एकमत हैं। जंहा सबका एकमत होता है वहां सिद्धांत, सफलता आ जाती है। जैसे तरंगे भिन्न-भिन्न दिखती हैं परन्तु गहराई में शांत जल है, ऐसे ही ऊपर-ऊपर से भिन्न-भिन्न स्वाभाव दिखते हैं, परंतु अन्दर से वही चैतन्य है। यह अद्वैत ज्ञान है। इससे सारे सद्गुण पैदा होते हैं। विश्वभर की शंकाओ का समाधान केवल वेदान्त के ज्ञान से ही आता है।

इसलिए अद्वैत ज्ञान, एकात्मवाद का जो प्रकाश है वह जीवन में सुख-शांति देता है। हम घर में भी साधु हैं। एकमत हो के बैठते हैं”।

कबीर जी कि ऐसी अद्वैत निष्ठा देखकर गोरखनाथजी बड़े प्रसन्न हुए कि “आ हा ! गृहस्थी हों तो ऐसे हों।

ऐसा कोई आनंद और सामर्थ्य नहीं है जो अद्वैत की भावना से पैदा न हो। जिन-जिन व्यक्तियों के जीवन में जितना-जितना अद्वैत व्यव्हार, अद्वैत ज्ञान है, उन-उन व्यक्तियों के जीवन में सुख-शांति मधुरता व प्रसन्नता है और सफलता है और प्रकृति हर पग पर उनको सहायता पहुंचाती है।